Monday, 6 September 2010

ज्योतिष लय ब्रह्मांड की...

ज्योतिष विद्या भारत की बहुत सी महान उपलब्धियों में से एक है। हमारे ऋषियों और मुनियों ने वर्षों की अथाह मेहनत के बाद इस इस विज्ञान को लिपिबद्ध किया। ज्योतिष की शुरुआत समस्याओं के निरकरण के लिए नहीं हुई थी। यह तो महज मानव मन की जिज्ञासा थी, जो सबसे पहले सूर्य, चांद, पृथ्वी और तारों को देखकर सहज ही सबसे पहले इंसान के दिमाग में आई। जब इसके बारे में और जानने की इच्छा हुई तो ऋषियों ने सूर्य के दिन में और चंद्रमा के रात में निकलने का कारण जानना चाहा। इस दौरान उन्हें पृथ्वी के परिभ्रमण और परिक्रमण का पता चला, जिसकी वजह से दिन और रात होते थे। मौसम में परिवर्तन भी इसी कारण से होता था। यही ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ता गया और ज्योतिष विधा का जन्म हुआ। शुरुआत में इंसान के पास न तो रहने की समस्या थी और न ही खाने की। ऐसे में ज्योतिष का प्रयोग मौसम की जानकारी करने के लिए होता था। मगर, आज जबकि समय तेजी से चल रहा है और लोगों के पास हजारों समस्याएं हैं, ऐसे में उनका कारण और निराकरण सिर्फ इसी विधा से सही से लगाया जा सकता है क्योंकि यह विज्ञान पर आधारित है। कुंडली पर आधारित फलित ज्योतिष का संबंध वेदों से नहीं है।
ज्योतिष विज्ञान की श्रेणी में आता है। यह उतना ही पुराना है जितने की वेद। इसलिए इसे वेदांग भी कहते हैं। जो तारे-सितारों की चमक या ज्योति दिखाई दे रही है उसका धरती के मौसम और जीवों के शरीर तथा मन पर होने वाले असर का अध्ययन करने की विद्या को ही ज्योतिष विद्या कहा जाता है। वैदिक ज्ञान के बल पर भारत में एक से बढ़कर एक खगोलशास्त्री, ज्योतिष व भविष्यवक्ता हुए हैं। इनमें गर्ग, आर्यभट्ट, भृगु, बृहस्पति, कश्यप, पाराशर वराहमिहिर, पित्रायुस, बैद्धनाथ आदि प्रमुख हैं। वराहमिहिर का ज्ञान काफी उच्चकोटि का था और इस ज्ञान को उन्होंने यवनों को भी दिया था। भारत से यह ज्ञान ग्रीक गया। भारत के साथ ही ग्रीक, चीन, बेबीलोन, परशिया (ईरान) आदि देशों के विद्धानों ने भी ज्योतिष शास्त्र का विस्तार अपने यहां की आबोहवा को जानकर किया। आज से करीब 2600 वर्ष पूर्व चेल्डिया के पंडितों व पुजारियों ने इस विषय पर गहन शोध किया और इसकी बारीकियों को उजागर किया।

'ज्योतिष लय ब्रह्मांड की बहती सरित समान, उद्गम पर अध्यात्म है संगम पर विज्ञान'


प्रारंभ में यह ज्ञान राजा, पंडित, आचार्य, ऋषि, दार्शनिक और विज्ञान की समझा रखने वालों तक ही सीमित था। ये लोग इस ज्ञान का उपयोग मौसम को जानने, वास्तु रचना करने तथा सितारों की गति से होने वाले परिवर्तनों को जानने के लिए करते थे। इस ज्ञान के बल पर वे राज्य को प्राकृतिक घटनाओं से बचाते थे और ठीक समय पर ही कोई कार्य करते थे। धीरे-धीरे यह विद्या जन सामान्य तक पहुंची तो राजा और प्रजा सहित सभी ने इस विद्या में मनमाने विश्वास और धारणाएं जोड़ी। अंध विश्वास के काराण धीरे-धीरे इसमें विकृतियां आने लगीं, लोग इसका गलत प्रयोग करने लगे। राजा भी इस विद्या के माध्यम से लोगों को डराकर अपने राज्य में विद्रोह को दबाना चाहता था और पंडित ने भी अपना चोला बदल लिया था। यह बिल्कुल उसी तरह से हो गया, जैसा आज सत्ता और पुलिस प्रशासन के बीच अवैध संबध हैं। इस सब कारण के चलते विद्धान ज्योतिषाचार्य व ज्योतिषग्रंथ समाप्त हो गए। शोध कार्य मृतप्राय होकर बंद हो गया। अज्ञानी लोगों ने ज्योतिष का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। इसे व्यापार का रूप देकर धन कमाने के लालच में झाूठी भविष्यवाणी करके शोषक वर्ग शोषण के धंधे में लग गया। जो भविष्यवाणी सच नहीं होती उसके भी मनमाने कारण निर्मित कर लिए जाते और जो सच हो जाती उसका बढ़ाचढ़ाकर प्रचार-प्रसार किया जाता है। ऐसे में जरूरत है इस विद्या के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सही ज्ञान का विस्तार करने की।
शुभम् भूयात।

शशांक शेखर बाजपेई (09977818811)
उमेश गुप्ता 'उद्देश्य' (09219280518)


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